समझे न तुम इस नाराज़गी को,
कहती है क्या तुमसे सनम,
चाहत का घड़ा था फूट गया,
हटता जा रहा तुमसे मन।
होती थी जो कश्मकश,
हमरे तोहरे बीच सज़न जब,
अब उसमें है अड़चन आई,
घटता जाता अपना मिलन।
खुशबूओं को तेरे शाख़ दिया है,
तेरे जिस्मों को मैंने माप दिया है,
होना है मुझे तुझमें मगन,
करना तु कुछ ऐसा यतन।।।
स्व-रचित :- #अंकित सोनी
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